लंबा नहीं कह सकता लेकिन इतना जरुर कह सकता हूं...एक अच्छा वक्त इस मीडिया में दिया है...लूट लाओ और कूट खाओ की संस्कृति में पिल चुका पत्रकार मजबूर भी होता है और बेसहारा भी...नजदीक से जानने का मौका मिला कि हर कोई रविश इतनी उंचायी पर नहीं पहुंच सकते..शायद ये युगपुरुष है...और पत्रकारिता जगत में अपने गंवई अंदाज में फेमस हो चुके भईया जी महापुरुष भी हो जाएंगे...बहुत खुश होता हूं जब ऐसे महान पत्रकारों से कभी फोन तो कभी घर पर बैठकर इनसे बात हो जाती है...कुछ दिन पहले मुझे पता चला कि रविश भइया पटना आने वाले हैं...फिर क्या था...मैं सुबह सुबह पहुंच गया उनके घर...लपकता हुआ बैठकखाने तक पहुंच गया...घर के नौकरों ने पूछा भईया जी किनसे मिलना है...मैने कहा रविश भईया जी से...उन्होंने कहा आप बैठिए वे आते हैं...दो मिनट बाद ही एक व्यक्ति फिर आया कहा माफ कीजिएगा बबलू भईया नहीं आए हैं...मैं मायूष हुआ और घर लौट आया...लेकिन एक पत्रकार के लिए एक सीनियर और गोयनका अवार्ड से नवाजे गए पत्रकार के यहां जाना बिल्कुल वैसा ही लग रहा था जैसे मंदिर से आया हूं....दिन भर उर्जा से भरा रहा....लेकिन यकीन मानिए ज्यादा देर तक नहीं...इन दिनों पत्रकारिता बंद होते और बिकते चैनलों की भरमार की आदी हो चुकी है...अखबारों के हेडलाइन कुर्सी के बगल से तय हो रहे हैं..तो खबरिया चैनल की बागडोर उनके हाथों में है जिन्हें पत्र से कोई मतलब ही नहीं...एक ऐसे ही चैनल की बात करुंगा ...जिनके मालिक ने गणतंत्र दिवस के मौके भ्रष्टाचार के खात्मे की सौगन्ध खायी थी...लेकिन संयोगवश उनका काम ही भ्रष्टाचार शुरु होता है....और खत्म भी....सीबीआई के छापे में जवाब नहीं देना पड़े इसलिए तौलिए में ही भाग खड़े होते हैं...और बात होती है गरीबों की आवाद बनने की...ये कोई पहला या दूसरा चैनल नहीं..कुछ बड़े चैनलों को छोड़ दिया जाए तो कमोवेश हालत यही है....अब ऐसे में जब पत्रकार ही बीमार हैं....लाचार हैं...बेसुध हैं....बेपनाह हैं...तो क्या मान लिया जाए कि चौथा खंभा दुरुस्त है...शायद नहीं...अब ऐसे में हम तो यही चाहेंगे कि कम से कम बिहार और झारखंड में रविश जी जैसे पत्रकारों की जरुरत है...क्यूंकि सच्ची कहानियां बननी जरुरी हैं...